शुद्ध ज्ञान -हमारा सच्चा पथ प्रदर्शक
दुनिया में जीवित रहने वाला हर एक व्यक्ति सुख चाहता है ,अब यह सुख मिलता कहां से है? कौन देता है हमें सुख? हम सुखी कैसे होसकते हैं? थोड़ा सा सुख पाने के लिए हमें क्या-क्या करना पड़ता है? आखिर सुख का स्रोत क्या है? ऐसे ढेर सारे प्रश्न हमारे मन व मस्तिष्क में जल तरंग के भांति जन्म लेते रहते हैं।
व्यक्ति को जो सबसे अधिक सुकून मिलता है वह उसके निजी क्रिया के कारण मिलता है। व्यक्ति जो कुछ भी क्रियाएं करता है उन क्रियाओं को वह ज्यादातर दर्शन द्वारा देख करके ही सीखता है ।अभी यह क्रिया उसके सम्यक ज्ञान के कारण होता है। अर्थात किसी काम मैं निपुण व्यक्ति को उस काम को करने में आनंद आता है, वही उसी काम से अनजान व्यक्ति को उस काम को करने में मजा या सुख नहीं आता है सीधे-सीधे अर्थ में व्यक्ति जो कार्य करता है इसका उससे सही ज्ञान होना नितांत आवश्यक है । उदाहरण के तौर पर मान लीजिए एक गाड़ी चलाने वाले व्यक्ति है जो इस कार्य में निपुण है उसे सुख मिलता है वहीं पर जो गाड़ी चलाने में असमर्थ है या नया है यदि वह गाड़ी चलाने सही तरीके से नहीं जानता है तो उसे डर ,शंका ,भय आदि का दुःख बना रहता है कि कहीं यह गाड़ी मेरे से दुर्घटना का कारण ना बन जाए। अर्थात् वह दुःखी है।
जैसा दर्शन वैसा ज्ञान ,जैसा ज्ञान वैसा जीवन ,जैसी जीवन वैसी क्रिया ,जैसा क्रिया वैसा फल।
महर्षि मनु जी जी मनुस्मृति लिखते हैं-
सम्यग् दर्शन संपन्नः कर्मभिर्न निबद्ध्यते ।
दर्शनेन विहीनस्तु संसारं प्रतिपद्ययते।।मनु⁰6.74।।
विषयों में सुख का दर्शन करने वाला व्यक्ति विषयों का सुख लिये बिना रह नहीं सकता, दूसरी तरफ विषय में दुुःख दर्शन करने वाला व्यक्ति कभी भी विषयों से जुड़ नहीं सकता।
कर्म और उपासना का प्रारंभ दर्शन से ही होता है यदि दर्शन बिगड़ता है तो कर्म और उपासना भी उसके अनुरूप ही हो जाते हैं, अतः दर्शन शुद्ध होना चाहिए। दर्शन शुद्ध भी होता है और अशुद्ध भी इसकी पहचान हमारी अंतरात्मा शास्त्र व गुरुजनों से ही होती रहती है। हम जो चाहते हैं उसेे पाने के लिए कार्य करते हैं और उसे पाते हैं अब यह चाहत सदा सर्वदा सर्वत्र दर्शन के अनुरूप ही होता है। जिसे हम पाना चाहते हैं उसे पाने के लिए शुद्ध दर्शन होना चाहिए अन्यथा कार्य में बाधा उत्पन्न होता है।
यह संसारं तो हर प्रकार से मनुष्य को उत्तेजित करने के लिए तैयार रहता है ।व्यक्ति की कुशलता इसी में है कि वह कैसे भी करके अपने आप को और अनुत्तेजित रखें प्रतिक्षण सजग ,चौकन्ना, सचेत व प्रमाद रहित व्यक्ति विषम से विषम परिस्थितियों में भी सहजता से पार हो जाता है ।अभिमान से ही प्रमाद की शुरुआत होती है, अतः विनाश या सर्वनाश की जड़ अभिमान है इस से बच कर रहना चाहिए।
एक बुद्धिमान् मनुष्य तो वह होता है-- जिसने एक बार देख लिया की यह आग है और आग का काम जलाना होता है फिर उस में सदा सदा के लिए हाथ ना डालें यदि वह व्यक्ति आग जलाता है इस बात को जानते हुए भी उसमें हाथ को डालता है तो उसे दुःख होता है। यहां पर आग के जलन स्वभाव को जानते हुए उससे दूर रहना है सुख है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि संसार में दुःख देने वाली कार्य से दूर रहना है सुख है चाहे वह विषय कोई भी हो।
मन की अत्यंत गंभीर ,शांत ,शालीन व सौम्य स्थिति में ही सुख है मन की चंचलता व्यक्ति को भटकाव की ओर ले जाताा है ।
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