ज्ञान व अज्ञान का परिणाम
ज्ञानी व्यक्ति सरल स्वभाव का होता है वही अज्ञानी व्यक्ति क्रूर स्वभाव का होता है ।ज्ञानी व्यक्ति ज्ञान के कारण उसके हृदय में दया ,करुणा ,स्नेह जैसे व्यवहारिक गुण देखने को मिलते हैं। अज्ञानी व्यक्ति ज्ञान -शून्य होने के कारण उसके हृदय में छल ,कपट ,स्वार्थ जैसे व्यवहारिक दुर्गुण देखे जातेे हैं।
क्रूरता बहुत बुरी चीज है। क्रूर व्यक्ति महा स्वार्थी व अत्यंत स्वेच्छाचारी होता है। उसे दूसरों के सुख-दुःख से कुछ लेना-देना नहीं होता। बस जो उसके मन में आए वह पूरा होना चाहिए। क्रोध में तो साक्षात क्रूरता का खुला दृश्य देखने को मिलता है और सामान्य रूप से यही समझा जाता है की क्रोध और क्रूरता पर यह एक जैसे हैं या फिर क्रोध का परिणाम क्रूरता है। पर वस्तुतः दया व करुणा के अभाव का नाम ही क्रूरता है। व्यक्ति का ह्रदय या तो करुणा से ओतप्रोत होता है या फिर क्रूरता से। जैसे जहां प्रकाश होता है वहां अंधकार नहीं होता है और यदि अंधकार होता है तो इसका अर्थ होता है कि वहां प्रकार नहीं है। ऐसे में क्रोध का परिणाम क्रूरता नहीं , बल्कि क्रूर हृदय का परिणाम क्रोध है और केवल क्रोध ही नहीं सबका सब निषेध वर्ग क्रूर हृदय का ही परिणाम है। यदि हम किसी का सहयोग करनाा चाहते हैं तो अपने हृदय में दया , करुणा वह प्रेम का विकास करना ही पड़ेगा । जिस चीज की बार-बार इच्छा की जाती है याा जिसकी और बार-बार ध्यान दिया जाता है , वह हमारे अंदर विकसित हो जाती है ।उससे विरोधी भावना धीरे धीरे कमजोर पड़ती जाती है और एक समय आता है जब वह समूल ही नष्ट हो जाती है । क्रूरता का परिणाम पूर्ण विनाश है , अपना भी और दूसरों का भी। अतः इसके प्रति अत्यंत सजग रहने की आवश्यकता है।
एक व्यक्ति ने किसी कार्य , व्यवहार, आचरण को या किसी विचार को कष्टदायक , अपने अथवा दूसरों के लिए हानिकारक समझ लिया , यहां तक समझ लिया कि अमुक व्यवहार आचरण या विचार में व्यक्ति और समाज दोनों का महान विनाश छुपा हुआ है, इस समझ के कारण कुछ समय के लिए उस विनाशकारी आचरण से हटा भी रहा। जब विनाशकारी आचरण से हटता है तो उसका निश्चय बहुत अधिक दृढ़ होता है , यहां तक सोच लेता है कि अब सदा सदा के लिए यह काम नहीं करूंगा। यथा किसी भी व्यक्ति से बहस नहीं करूंगा , कैसे भी विषम से विषम परिस्थिति आए बाह्य हानी उठाकर भी क्रोध नहीं करूंगा , किसी भी अवस्था में अपने अहं को बीच में नहीं आने दूंगा, इंद्रियों के विषयों से प्रभावित नहीं होऊंगा , किसी भी भौतिक लाभ के कारण लोभ में नहीं फसूंगा , आठ प्रकार के ब्रम्हचर्य का पालन करूंगा , मन की चंचलता से होने वाली हानियों को मैंने ठीक से समझ लिया है अतः अब कभी भी मन को चंचल नहीं होने दूंगा। मन को सदा शांत ही रखूंगा रखूंगा, जागरूक रखूंगा, हर परिस्थिति में वाणी का संयम बनाए रखूंगा, अपने और दूसरों के लिए हानि रहित होकर जिऊंगा।
जिसने अपनी ज्ञान- समाधान रूप अंतर्निहित पूर्णता को पहचान लिया वह सामंजस्य में जीने लगता है।
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