श्रद्धा भक्ति प्रेम
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है उसका किसी ना किसी के साथ संबंध अवश्य रहता है। संबंध के अभाव मे या संबंध के टूट जाने पर वह स्वयं को अकेला महसूस करता है।जिस प्रकार हर कार्य के पीछे कारण छिपा होता है अर्थात बिना कारण के कार्य संभव नहीं है ठीक उसी प्रकार संबंध के पीछे व्यक्ति का संबंधित व्यक्ति के प्रति श्रद्धा भक्ति प्रेम छिपा होता है। अब यह श्रद्धा भक्ति प्रेम क्या है ? व्यक्ति को किस प्रकार से प्रभावित करते हैं ? आइए इनको सरलता से समझने का प्रयास करते हैं।
राजा विक्रमादित्य का राज्य उज्जैन में एक बूढ़ी माता रहती थी। वह साधु महात्माओं के प्रति बहुत श्रद्धा रखती थी। एक बार उन्होंने एक बहुत बड़े संत को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया। प्रातः बहुत शीघ्र ही उठ कर रसोई में लेपन आदि करने के बाद अत्यंत श्रद्धा व मनोयोग के साथ भोजन बनाने में जुट गई। लगभग वीषियों प्रकार के व्यंजन बनाएं सब के सब एक से बढ़कर स्वादिष्ट थे। इन सब को बनाने में लगभग 7 घंटे का समय लगा। निर्धारित समय पर श्री संत जी आप पहुंचे। आसन लगा दिया गया , श्रद्धा पूर्वक भोजन परोस दिया गया। माता बहुत प्रसन्न है की आज संत जी से एक एक व्यंजन पर खूब प्रशंसा प्राप्त होगी। इन पर महात्माओं की मौज का क्या ठिकाना ?स्वामी जी ने सभी व्यंजनों को जितना अपने लिए पर्याप्त समझा, एक ही जगह इकट्ठा कर लिया और खाने लगे। स्वामी जी उनकी श्रद्धा व श्रम से पूर्ण संतुष्ट थे , पर माता को एक विशेष से सीख देना चाहते थे , अतः प्रशंसा पर एक शब्द भी उच्चारण नहीं किया।
स्वामी जी के इस व्यवहार को देखकर माता थोड़ी उदास हो गई , भोजन , भोजन परोसने से पहले जो उत्साह था वह मंद पड़ गया। स्वामी जी ने माता की उदासी को भांप लिया और कहने लगे-- "देखो! यदि हम इसलिए देना चाहते हैं कि हमें भी कुछ मिले तो यह देना नहीं बल्कि व्यापार हो जाता है और यदि देना जब 'विशुद्ध देना' होता है तो वह समर्पण हो जाता है देने वाला जब कुछ भी अपेक्षा रख कर देता है और वह अपेक्षा उसकी पूरी नहीं होती तो देने का सारा रस ही समाप्त हो जाता है। यदि हम सेवक हैं और सेवा के बदले कुछ चाहते हैं तो वह सेवा सेवा में रहकर एक शांत फल को देने वाला कर्म मात्र रह जाती है। उस सेवा से प्राप्त फल के द्वारा हम अपने मन इंद्रियों व शरीर को अल्पविराम अधिक से अधिक अपने अहं को तृप्त कर सकते हैं, उस फल के द्वारा कभी भी हमारी अंतरात्मा तृप्त नहीं हो सकती।
यदि हम भक्त हैं किसी मूर्त फल के लिए भजन कर रहे हैं तो वह भक्ति बहुत संभव है निराशा में बदल जाए। कोई सच्चे अर्थ में सेवक , भक्त दाता है तो वहां निराशा होने के लिए एक क्षण का भी अवकाश नहीं। यही बात एक सच्चे प्रेमी या श्रद्धालु पर घटती है। श्रद्धा- भक्ति- प्रेम यह सदा बढ़ने वाली की चीजें हैं किंतु यह तभी संभव है जब इनके पीछे कोई भी अलौकिक हेतु नहीं होता। अलौकिक संबंधों के संबंध में प्रसंग में जब इन शब्दों का प्रयोग किया जाता है तो इनको कम होते हुए और घटते हुए भी देखा जाता है। संसार में यह बहुत सुनने को मिल जाता है जैसा पहले अमुक व्यक्ति के प्रति मेरा श्रद्धा भक्ति प्रेम था वैसा अब नहीं रहा , उसका कारण यही है कि वहां कोई ना कोई इच्छा या अपेक्षा एक साथ रहती है। वह जब पूरी नहीं होती तो प्रेम कम हो जाता है , श्रद्धा टूट जाती है। अतः ऐसा लगता है अंतरात्मा (चैत्य पुरुष )ईश्वर या शाश्वत के संदर्भ में इन शब्दों का प्रयोग किया जाए तो निश्चित रूप से यह चीजें बढ़ने वाली होगी। वहां भी यदि मन में कोई अलौकिक इच्छा रख कर ईश्वर को समर्पित हो रहा है तो उसका समर्पण दिनों दिन बढ़ता ही रहेगा यह असंभव है।
किसी भी प्रकार की अलौकिक कामना( धन- वैभव , प्रतिष्ठा, सत्ता- शक्ति , पुत्र -शिष्यादि) से मुक्त होकर जो अपने आप को समर्पित कर देता है , भक्ति में जुट जाता है, प्रेमी हो जाता है तो निश्चित रूप से ऐसे ज्ञानी की श्रद्धा -भक्ति -प्रेम बढ़ते ही रहेंगे ।इस बात को कोई किसी भी समय अनुभव करके देख सकता है। अतः जो चाहते हैं कि उनकी श्रद्धा भक्ति प्रेम अब भी और आगे भी अर्थात् कालांतर में भी निराशा में बदलने वाले ना हो, उन्हें लेने के लिए नहीं देना चाहिए , बल्कि देते ही रहना चाहिए और कुछ लेते भी है तो वह , भी देने के लिए ही होना चाहिए। व्यक्ति के द्वारा अपनी आत्मा अग्नि में कर्म के रूप में आहुतियां दी जाती रहे तो इस प्रक्रिया से कर्म व कर्म फल की आसक्ति से मिलने वाले दुख से बचा जा सकता है क्योंकि उस अवस्था में कर्ता को कर्म के द्वारा कुछ पाने की चाहत नहीं होती ।
सार
1. वह 'निरपेक्ष है' , किंतु हम जीवित चाहे तो उस से युक्त होकर रह सकते हैं और अपने समस्त समस्याओं का समाधान प्राप्त कर सकते हैं।2. 'प्रार्थना है' हमारे संपूर्ण अस्तित्व की एक ही मांग हमारी अंतिम आवश्यकता हमारे परम गंतव्य का संज्ञान।
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