Friday, 8 May 2020

चाणक्य नीति प्रथम अध्याय

                                              चाणक्य नीति
                                              प्रथम अध्याय
 ईश्वर प्रार्थना -
                           प्रणम्य शिरसा विष्णुं त्रैलोक्यधिपतिं प्रभुम्।
                           नाना शास्त्रोद्धृतं वक्षे राजनीति समुच्चयम् .1 l
चाणक्य जी तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) के स्वामी भगवान विष्णु के चरणों में शीश नवाकर प्रणाम द्वारा अनेक शास्त्रों से उद्धृत राजनीति के समापन का वर्णन करते हैं।
 अच्छा आदमी कौन है? -
                                अधीत्येदं यथा विज्ञानं नरो गोति सत्तमः।
                                धर्मोपदेशविषयकं कार्या s कार्याशुभाशुभम्।।2 l
धर्म का उपदेश देने वाले, कार्य -अकार्य, शुभ -अशुभ को बताने वाले इस चाणक्य नीति शास्त्र को पढ़कर जो व्यक्ति सही रूप में इसे जान जाता है वही श्रेष्ठ मनुष्य है।
 कौन आदमी सुखी होता है? -
                                 मूर्खस्योपदेशेन लोकतंत्रास्रीभरणेन च।
                                दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितो s शुद्धवदति।।३ ल
मूर्खों को पढ़ाने से, उपदेश देने से, स्त्री स्त्री का भरण-पोषण करने से और दुःखी लोगों के साथ रहने पर विद्वान व्यक्ति भी दुःखी होता है।यानी यह कह सकते हैं कि कोई चाहे कितनी ही समझदार क्यों ना मूर्ख बच्चों को पढ़े। पर, दुष्ट स्त्री के साथ जीवन ठहराने पर और दुखियों- रोगियों के बीच में रहने पर विद्वान व्यक्ति भी दुखी हो ही जाता है।
 अतहर नीति यही कहती है कि मूर्खों को शिक्षा नहीं देनी चाहिए। दुष्ट स्त्री से संबंध नहीं रखना चाहिए उसे दूर ही रहना चाहिए और दुखी व्यक्तियों के बीच में नहीं रहना चाहिए।
मनुष्य के मृत्यु के कारण कौन होते हैं? -
                                   दुष्टा भार्या शठं मित्रं भांतश्चर्यजनकः।
                                   सस्र्पे गृहे वासों मृत्युरेव न संशयः।।4 एल
चार चीजें किसी भी व्यक्ति के लिए जीती -जगति मृत्यु के समान हैं:: चरित्र चरित्र व्यभिचारिणी पत्नी 2: दानव धोखेबाज मित्र 3: जवाब देने वाला अर्थात मुहा लगाने वाला नौकर 4: घर में रहने वाला सांप। इन सब को समय रहते ही घर से निकाल देना चाहिए।
संकट से बचने के लिए क्या करें?
                                  आपदार्थे धनं रक्षेत् दारंग रक्षेत् धनैरपि।
                                  आत्मानं सततं रक्षेद् दैरैरपि धनैरपि।।५ एल
 विपत्ति समय में अपनी रक्षा के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए। धन से अधिक पत्नी की रक्षा करनी चाहिए अपनी रक्षा का प्रश्न सामने आने पर पहले आत्म का रक्षा करना चाहिए क्योंकि अपनी रक्षा होने पर ही धन और पत्नी की रक्षा की जा सकती है।
 किस स्थान (स्थान) पर नहीं रहना चाहिए? - यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः।                                  न च विद्यागमो s पुस्ति वासस्तत्र न कारयेत् ।।६    जिस देश में सम्मान न हो, जहां कोई आजीविका न मिले, जहां उसका कोई भाई बंधु न रह जाए और जहां विद्या अध्ययन संभव न हो ऐसे स्थान पर नहीं रहना चाहिए।     अर्थात् जिस देश या शहर में निम्नलिखित सुविधाएं न हों उस स्थान को छोड़ देना चाहिए - 1। जहां व्यक्ति का सम्मान ना होता हो।                  2. जहाँ व्यक्ति को कोई काम ना मिल सके।
                                 




                 3. जहाँ अपना कोई सगा -संबंधी या परिचित व्यक्ति ना रहता हो।
                 4. जहां विद्या प्राप्त करने के साधन अर्थात स्कूल और पुस्तकालय आदि जैसी सुविधाएं न होने पर उस स्थान को छोड़ देना चाहिए।
कौन सा परीक्षा कब होती है?
                                 जानियात् प्रेषनेभभृत्यान् बान्धवान्व्यसना ss गमे।
                                  मित्रं या ss पत्तिकालेषु भार्यां च विभवक्षये।।7
किसी महत्वपूर्ण कार्य पर भेजते समय सेवक (नौकर) की ईमानदारी की परीक्षा होती है। रोग या दुःख की घड़ी में सगा -संबंधियों की परीक्षा होती है। विपत्ति या खतरा के समय मित्र की पहचान होती है और परिवार में गरीबी व धन के नष्ट हो जाने पर पत्नी की परीक्षा होती है।
 किस पर भरोसा नहीं करना चाहिए?
                                     नखीनां च नदीनां च शृंगीणां शस्त्रपाणिनाम्।
                                     विश्वासो संस्कारः स्त्रीषु अभिलेषु च ।9 स्त्री विश्वसनीयता की लक्षणों को पहचान करते हुए व्यक्ति को चाहिए कि लंबे नाखूनों वाले हिंसक पशुओं, नदियों, बडे बडे सीगले जानवरों, शस्त्र धारियों, स्त्रीयों, राज -परिवारों के कभी विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि ये कब तक कर सकते हैं क्योंकि यह कोई जवाब नहीं देता है। नहीं है। सार को ग्रहण करना चाहिए- विषादप्यमृतं तत््यममेधादपि कांचनम्।                                       नीचदपुयुत्मान विद्यां स्त्रीरत्नं दुस्कुलादपि।।10
 

                                     

आचार्य चाणक्य जहां साध्य की महता बताते हुए साधन को गौण मानते हुए कहते हैं कि विष में भी अमृत और गंध में सोना मिले तो ग्रहण करना चाहिए उसी प्रकार यदि नीच व्यक्ति से भी उत्तम विद्या प्राप्त होती हो तो ग्रहण करना चाहिए और दानवों के कुल में। भी कोई बलवान, सुशील, श्रेष्ठ कन्या प्राप्त हो तो उसे स्वीकार करना चाहिए। क्या स्ट्रियां या पुरुष से आगे होते हैं?                                         स्त्रीन द्विगुण आहारो लज्जा चापि चतुर्गुणा।                                         साहसं षड्गुणं चैव कामश्चाष्गुटगुणः स्मृतः।।११ ।। आचार्य चाणक्य यहां पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों की क्रिया वृत्ति की तुलना करते हुए कहते हैं कि स्त्रियों में आहार दोगुना, लज्जा चौगुनी, साहस छःगुण और कामोत्तेजना आठ गुणा होता है।
 



     यहां वस्तुतः का नारी के बारे में जो कहा गया है उसकी निंदा नहीं बल्कि गुण की दृष्टि से प्रशंसा किया गया है जिसमें मेनन की अपेक्षा स्त्रियों की आहार करने की क्षमता दोगुना होती है। लज्जा चौगुनी होती है, किसी भी बुरे काम को करने की हिम्मत स्त्रीयों मे पुरुष से 6 गुना अधिक होती है और कामोत्तेजना संभोग की इच्छा पुरुष से स्त्री में 8 गुना अधिक होती है।
 यह गुणवत्ता उनके शारीरिक दायित्व -जिसका वे विवाह उपरांत बहन करती हैं के कारण होती है स्ट्रियों को गर्भ धारण करने होता है। संतानोत्पत्ति के बाद उसका पालन पोषण करना पड़ता है इस पूरी प्रक्रिया में उन्हें कितना कष्ट उठाना पड़ता है जिसकी कल्पना स्त्री के अलावा दूसरा कोई नहीं कर सकता है।


             






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