एक बार एक शिष्य ने अपने गुरु से प्रश्न किया-- "सुख किससे प्राप्त होता है"?गुरु ने उत्तर दिया-- "जिसका हृदय शांत होता है "।
शिष्य ने जिज्ञासा भाव से पूछा-- "किसका हृदय शांत रहता है ?"
गुरु ने उत्तर दिया --"जिसका मन चंचल नहीं होता "।
शिष्य ने पुनः पूछा --"किसका मन चंचल नहीं होता ?"
गुरु ने उत्तर दिया--" जिसे किसी वस्तु की अभिलाषा( चाह) नहीं है? उसका मन चंचल नहीं होता"।
शिष्य ने पूछा---" अभिलाषा किसे नहीं होता है ?
गुरु उत्तर दिया---"जिसको किसी वस्तु (सामान ,चीज )मे आसक्ति (इच्छा, लगाव)नहीं है, उसकी अभिलाषा समाप्त हो। जाती है "।
शिष्य ने पूछा ---आसक्ति किसे नहीं होता?
गुरुजी ने उत्तर दिया ---जिसकी बुद्धि में मोह (अज्ञान , भ्रम,) नहीं है ।
शिष्य ने पूछा ---यह कैसे हो सकता है? बताइए गुरुजी !!बताइए???
गुरुजी ने उत्तर दिया-- "चाह मिटी चिंता गई ,मनवा बे-परवाह।
जिसको कछू न चाहिए ,सो शाहन पति शाह।।"
सार--- आवश्यकता से अधिक वस्तु को प्राप्त करने की लालसा रखना ही दु:ख है तथा प्राप्त हुई वस्तुओं से संतोष रहना ही वास्तविक सुख है।
धन्यवाद ।
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