Sunday, 21 June 2020

श्रद्धा भक्ति प्रेम

                                    श्रद्धा  भक्ति प्रेम

 मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है उसका किसी ना किसी के साथ  संबंध अवश्य रहता है। संबंध के  अभाव मे या संबंध  के टूट जाने पर वह स्वयं को अकेला महसूस करता है।
 जिस प्रकार हर कार्य के पीछे कारण छिपा होता है अर्थात बिना कारण के कार्य संभव नहीं है ठीक उसी प्रकार संबंध के पीछे व्यक्ति का संबंधित व्यक्ति के प्रति श्रद्धा भक्ति प्रेम छिपा होता है। अब यह श्रद्धा  भक्ति प्रेम क्या है ? व्यक्ति को किस प्रकार से प्रभावित करते हैं ? आइए इनको सरलता से समझने का प्रयास करते हैं।
  राजा विक्रमादित्य  का राज्य उज्जैन में एक बूढ़ी माता रहती थी। वह साधु महात्माओं के प्रति बहुत श्रद्धा रखती थी। एक बार उन्होंने एक बहुत बड़े संत को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया। प्रातः बहुत शीघ्र ही उठ कर रसोई में लेपन आदि करने के बाद अत्यंत श्रद्धा व मनोयोग के साथ भोजन बनाने में जुट गई। लगभग वीषियों प्रकार के व्यंजन बनाएं सब के सब एक से बढ़कर स्वादिष्ट थे। इन सब को बनाने में लगभग 7 घंटे का समय लगा। निर्धारित समय पर श्री संत जी आप पहुंचे। आसन लगा दिया गया , श्रद्धा पूर्वक भोजन परोस दिया गया। माता बहुत प्रसन्न है की आज संत जी से एक एक व्यंजन पर खूब प्रशंसा प्राप्त होगी। इन पर महात्माओं की मौज का क्या ठिकाना  ?स्वामी जी ने सभी व्यंजनों को जितना अपने लिए पर्याप्त समझा, एक ही जगह इकट्ठा कर लिया और खाने लगे। स्वामी जी उनकी श्रद्धा व श्रम से पूर्ण संतुष्ट थे , पर माता को एक विशेष से सीख देना चाहते थे , अतः प्रशंसा पर एक शब्द भी उच्चारण नहीं किया।
   स्वामी जी के इस व्यवहार को देखकर माता थोड़ी उदास हो गई , भोजन , भोजन परोसने से पहले जो उत्साह था वह मंद पड़ गया। स्वामी जी ने माता की उदासी को भांप लिया और कहने लगे-- "देखो! यदि हम इसलिए देना चाहते हैं कि हमें भी कुछ मिले तो यह देना नहीं बल्कि व्यापार हो जाता है और यदि देना जब 'विशुद्ध देना' होता है तो वह समर्पण हो जाता है देने वाला जब कुछ भी अपेक्षा रख कर देता है और वह अपेक्षा उसकी पूरी नहीं होती तो देने का सारा रस  ही समाप्त हो जाता है। यदि हम सेवक हैं और सेवा के बदले कुछ चाहते हैं तो वह सेवा सेवा में रहकर एक शांत फल को देने वाला कर्म मात्र रह जाती है। उस सेवा से प्राप्त फल के द्वारा हम अपने मन इंद्रियों व शरीर को अल्पविराम अधिक से अधिक अपने अहं को तृप्त कर सकते हैं, उस फल के द्वारा कभी भी हमारी अंतरात्मा तृप्त नहीं हो सकती।
    यदि हम भक्त हैं किसी मूर्त फल के लिए भजन कर रहे हैं तो वह भक्ति बहुत संभव है निराशा में बदल जाए। कोई सच्चे अर्थ में सेवक , भक्त दाता है तो वहां निराशा होने के लिए एक क्षण का भी अवकाश नहीं। यही बात एक सच्चे प्रेमी या श्रद्धालु पर घटती है। श्रद्धा- भक्ति- प्रेम यह सदा बढ़ने वाली की चीजें हैं  किंतु यह  तभी संभव है जब इनके पीछे कोई भी अलौकिक हेतु नहीं होता। अलौकिक संबंधों के संबंध में प्रसंग में जब इन शब्दों का प्रयोग किया जाता है तो इनको कम होते हुए और घटते हुए भी देखा जाता है। संसार में यह बहुत सुनने को मिल जाता है जैसा पहले अमुक व्यक्ति के प्रति मेरा श्रद्धा भक्ति प्रेम था वैसा अब नहीं रहा , उसका कारण यही है कि वहां कोई ना कोई इच्छा या अपेक्षा एक साथ रहती है। वह जब पूरी नहीं होती तो प्रेम कम हो जाता है , श्रद्धा टूट जाती है। अतः ऐसा लगता है अंतरात्मा (चैत्य पुरुष )ईश्वर या शाश्वत के संदर्भ में इन शब्दों का प्रयोग किया जाए तो निश्चित रूप से यह चीजें बढ़ने वाली होगी। वहां भी यदि मन में कोई अलौकिक इच्छा रख कर ईश्वर को समर्पित हो रहा है तो उसका समर्पण दिनों दिन बढ़ता ही रहेगा यह असंभव है।
    किसी भी प्रकार की अलौकिक कामना( धन- वैभव , प्रतिष्ठा, सत्ता- शक्ति , पुत्र  -शिष्यादि) से मुक्त होकर जो अपने आप को समर्पित कर देता है , भक्ति में जुट जाता है, प्रेमी हो जाता है तो निश्चित रूप से ऐसे ज्ञानी की श्रद्धा -भक्ति -प्रेम बढ़ते ही रहेंगे ।इस बात को कोई किसी भी समय अनुभव करके देख सकता है। अतः जो चाहते हैं कि उनकी श्रद्धा भक्ति प्रेम अब भी और आगे भी अर्थात् कालांतर में भी निराशा में बदलने वाले ना हो, उन्हें लेने के लिए नहीं देना चाहिए , बल्कि देते ही रहना चाहिए और कुछ लेते भी है तो वह , भी देने के लिए ही होना चाहिए। व्यक्ति के द्वारा अपनी आत्मा अग्नि में कर्म के रूप में आहुतियां दी जाती रहे तो इस प्रक्रिया से कर्म व कर्म फल की आसक्ति से मिलने वाले दुख से बचा जा सकता है  क्योंकि उस अवस्था में कर्ता को कर्म के द्वारा कुछ पाने की चाहत नहीं होती ।

 सार

  1. वह 'निरपेक्ष है' ,  किंतु हम जीवित चाहे तो उस से युक्त होकर रह सकते हैं और अपने समस्त समस्याओं का समाधान प्राप्त कर सकते हैं।
2. 'प्रार्थना है' हमारे संपूर्ण अस्तित्व की एक ही मांग हमारी अंतिम आवश्यकता हमारे परम गंतव्य का संज्ञान।

ज्ञान व अज्ञान का परिणाम

                                ज्ञान व अज्ञान का परिणाम

      ज्ञानी व्यक्ति सरल स्वभाव का होता है वही अज्ञानी व्यक्ति  क्रूर स्वभाव का होता है ।ज्ञानी व्यक्ति ज्ञान के कारण उसके हृदय में दया ,करुणा ,स्नेह जैसे व्यवहारिक गुण देखने को मिलते हैं। अज्ञानी व्यक्ति ज्ञान -शून्य होने के कारण उसके हृदय में छल  ,कपट ,स्वार्थ जैसे व्यवहारिक दुर्गुण देखे जातेे हैं।
   क्रूरता बहुत बुरी चीज है। क्रूर व्यक्ति महा स्वार्थी व अत्यंत स्वेच्छाचारी होता है। उसे दूसरों के सुख-दुःख से कुछ लेना-देना नहीं होता। बस जो उसके मन में आए वह पूरा होना चाहिए। क्रोध में तो साक्षात क्रूरता का खुला दृश्य देखने को मिलता है और सामान्य रूप से यही समझा जाता है की क्रोध और क्रूरता पर यह एक जैसे हैं या फिर क्रोध का परिणाम क्रूरता है।  पर वस्तुतः दया व करुणा के  अभाव का नाम ही क्रूरता है। व्यक्ति का ह्रदय या तो करुणा से ओतप्रोत होता है या फिर क्रूरता से। जैसे जहां प्रकाश होता है वहां अंधकार नहीं होता है और यदि अंधकार होता है तो इसका अर्थ होता है कि वहां प्रकार नहीं है। ऐसे में क्रोध का परिणाम क्रूरता नहीं , बल्कि क्रूर हृदय का परिणाम क्रोध है और केवल क्रोध ही नहीं सबका सब निषेध वर्ग क्रूर हृदय का ही परिणाम है। यदि हम किसी का सहयोग करनाा चाहते हैं तो अपने हृदय में दया , करुणा वह प्रेम का विकास करना ही पड़ेगा । जिस चीज की बार-बार इच्छा की जाती है याा जिसकी और बार-बार ध्यान दिया जाता है , वह हमारे अंदर विकसित हो जाती है ।उससे विरोधी भावना  धीरे धीरे  कमजोर पड़ती जाती है और एक समय आता है जब वह समूल ही नष्ट हो जाती है ।  क्रूरता का परिणाम पूर्ण विनाश है , अपना भी और दूसरों का भी। अतः इसके प्रति अत्यंत सजग रहने की आवश्यकता है।
  एक व्यक्ति ने किसी कार्य , व्यवहार, आचरण को या किसी विचार को कष्टदायक , अपने अथवा दूसरों के लिए हानिकारक समझ लिया , यहां तक समझ लिया कि अमुक व्यवहार आचरण या विचार में व्यक्ति और समाज दोनों का महान विनाश छुपा हुआ है, इस समझ के कारण कुछ समय    के लिए उस विनाशकारी आचरण से हटा भी रहा। जब विनाशकारी आचरण से हटता है तो उसका निश्चय बहुत अधिक दृढ़ होता है , यहां तक सोच लेता है कि अब सदा सदा के लिए यह काम नहीं करूंगा। यथा किसी भी व्यक्ति से बहस नहीं करूंगा , कैसे भी विषम से विषम परिस्थिति आए बाह्य हानी उठाकर भी क्रोध नहीं करूंगा , किसी भी अवस्था में अपने अहं को बीच में नहीं आने दूंगा, इंद्रियों के विषयों से प्रभावित नहीं होऊंगा , किसी भी भौतिक लाभ के कारण लोभ में नहीं फसूंगा , आठ प्रकार के ब्रम्हचर्य का पालन करूंगा , मन की चंचलता से होने वाली हानियों को मैंने ठीक से समझ लिया है अतः अब कभी भी मन को चंचल नहीं होने दूंगा। मन को सदा शांत ही रखूंगा रखूंगा, जागरूक रखूंगा, हर परिस्थिति में वाणी का संयम बनाए रखूंगा, अपने और दूसरों के लिए हानि रहित होकर जिऊंगा।
   जिसने अपनी ज्ञान- समाधान रूप अंतर्निहित पूर्णता को पहचान लिया वह सामंजस्य में जीने लगता है।

Thursday, 18 June 2020

शुद्ध ज्ञान- हमारा पथ प्रदर्शक

                             शुद्ध ज्ञान -हमारा सच्चा पथ प्रदर्शक

  दुनिया में जीवित रहने वाला हर एक व्यक्ति सुख चाहता है ,अब यह सुख मिलता कहां से है? कौन देता है हमें सुख? हम सुखी कैसे होसकते हैं? थोड़ा सा सुख पाने के लिए हमें क्या-क्या करना पड़ता है? आखिर  सुख का स्रोत क्या है? ऐसे ढेर सारे प्रश्न हमारे मन व मस्तिष्क में जल तरंग के भांति  जन्म लेते रहते हैं।
व्यक्ति को जो सबसे अधिक सुकून मिलता है वह उसके   निजी क्रिया के कारण मिलता है। व्यक्ति जो कुछ भी क्रियाएं करता है  उन क्रियाओं को  वह  ज्यादातर  दर्शन द्वारा देख करके ही सीखता है ।अभी यह  क्रिया  उसके सम्यक ज्ञान के कारण होता है। अर्थात किसी काम मैं निपुण व्यक्ति को उस काम को करने में आनंद आता है, वही उसी काम से अनजान व्यक्ति को उस काम को करने में मजा या सुख नहीं आता है सीधे-सीधे अर्थ में व्यक्ति जो कार्य करता है इसका उससे सही ज्ञान होना नितांत आवश्यक है । उदाहरण के तौर पर मान लीजिए एक गाड़ी चलाने वाले व्यक्ति है जो  इस कार्य में निपुण है उसे सुख मिलता है वहीं पर जो गाड़ी चलाने में असमर्थ है या नया है यदि वह गाड़ी चलाने सही तरीके से नहीं जानता है तो उसे डर ,शंका ,भय आदि का दुःख बना रहता है कि कहीं यह गाड़ी मेरे से दुर्घटना का कारण ना बन जाए। अर्थात् वह दुःखी है।
   जैसा दर्शन वैसा ज्ञान ,जैसा  ज्ञान वैसा जीवन ,जैसी जीवन वैसी क्रिया  ,जैसा क्रिया  वैसा फल।
   महर्षि मनु जी जी मनुस्मृति लिखते हैं-
                            सम्यग् दर्शन संपन्नः  कर्मभिर्न निबद्ध्यते ।
                            दर्शनेन विहीनस्तु संसारं प्रतिपद्ययते।।मनु⁰6.74।
विषयों में सुख का दर्शन करने वाला व्यक्ति विषयों का सुख लिये  बिना रह नहीं सकता,  दूसरी तरफ विषय में दुुःख दर्शन करने वाला व्यक्ति कभी भी विषयों से जुड़ नहीं सकता।
 कर्म  और उपासना का प्रारंभ दर्शन से ही होता है यदि दर्शन बिगड़ता है तो कर्म और उपासना भी उसके अनुरूप ही हो जाते हैं, अतः दर्शन शुद्ध होना  चाहिए। दर्शन शुद्ध भी होता है और अशुद्ध भी इसकी पहचान  हमारी अंतरात्मा शास्त्र व गुरुजनों से ही होती रहती है।  हम जो चाहते हैं उसेे पाने के लिए कार्य करते हैं और उसे पाते हैं अब यह चाहत सदा सर्वदा सर्वत्र दर्शन के अनुरूप ही होता है। जिसे हम पाना चाहते हैं उसे पाने के लिए शुद्ध दर्शन होना चाहिए अन्यथा कार्य में बाधा उत्पन्न होता है।
           यह संसारं तो  हर प्रकार से मनुष्य को उत्तेजित करने के लिए तैयार रहता है ।व्यक्ति की कुशलता इसी में है कि वह कैसे भी करके अपने आप को और अनुत्तेजित रखें प्रतिक्षण सजग ,चौकन्ना, सचेत व प्रमाद रहित व्यक्ति विषम से विषम परिस्थितियों में भी सहजता से पार हो जाता है ।अभिमान से ही प्रमाद की शुरुआत होती है, अतः विनाश या सर्वनाश की जड़  अभिमान है इस से बच कर रहना चाहिए।
             एक बुद्धिमान् मनुष्य तो  वह होता है--  जिसने एक बार देख लिया की यह आग है और आग का काम जलाना होता है फिर उस में सदा सदा के लिए हाथ ना डालें यदि वह व्यक्ति आग जलाता है इस बात को जानते हुए भी उसमें हाथ को डालता है तो उसे दुःख होता है। यहां पर आग के जलन स्वभाव को जानते हुए उससे दूर रहना है सुख है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि संसार में दुःख देने वाली कार्य से दूर रहना है सुख है चाहे वह विषय कोई भी हो।
मन की  अत्यंत गंभीर ,शांत ,शालीन व सौम्य स्थिति में ही सुख है मन की चंचलता व्यक्ति  को भटकाव की ओर ले जाताा है ।

श्रद्धा भक्ति प्रेम

                                    श्रद्धा  भक्ति प्रेम  मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है उसका किसी ना किसी के साथ  संबंध अवश्य रहता है। संबं...